नेहरू की सुंदरता ने अमृता शेरगिल के कैनवास को खाली रखा GAUTAM KUMAR

नई दिल्ली। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अमृता शेरगिल की असाधारण प्रतिभा और सुंदरता से बेहद प्रभावित थे और दोनों के बीच अच्छी मित्रता भी हो गई थी लेकिन उन्हें इस असाधारण कलाकार के कैनवास पर कभी जगह नहीं मिल पाई। इसका कारण महिला चित्रकार की यह सोच थी कि नेहरू काफी सुंदर दिखाई देते हैं।

अमृता ने अपनी शर्तों पर जीवन जिया था तथा अपने प्रेम-प्रसंगों एवं अपारंपरिक शैली के कारण उस दौर के समाज में वे चर्चा का केंद्र बन गई थीं। उनका करिश्माई व्यक्तित्व, उनकी शारीरिक सुंदरता और उनका नाटकीय जीवन- इन सबके कारण वे कई लोगों की कल्पना को आकर्षित करती थीं। एक महिला के रूप में एकांत के प्रति उनकी भूख तथा विरोधाभासों के प्रति उनके संघर्ष ने उनकी जिंदगी को और भी उल्लेखनीय बना दिया था।

अमृता के व्यक्तित्व के इन बारीक पहलुओं को कला इतिहासकार यशोधरा डालमिया द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी ‘अमृता शेरगिल : ए लाइफ’ में संजीदा ढंग से पेश किया गया है। अमृता की 1941 में जब महज 28 साल की आयु में मृत्यु हुई तो वे अपने पीछे ऐसी कलाकृतियां छोड़ गईं जिन्होंने उन्हें शताब्दी के अग्रणी कलाकारों की पंक्ति में ला खड़ा किया। पूर्व एवं पश्चिम के कला संगम में वे एक मनोहारी प्रतीक बनकर उभरीं।

अमृता की नेहरू से मुलाकात दिल्ली में हुई थी। लेखिका के अनुसार नेहरू से उनकी मुलाकात ऐसे माहौल में एकमात्र घटनापूर्ण चीज थी, जो चित्रकार के अनुसार चित्रांकन के लिए हर्गिज भी उपयुक्त नहीं थी। राजधानी के कामकाजी माहौल के बीच नेहरू उन्हें काफी भिन्न नजर आए। दोनों के बीच कई बार पत्राचार हुआ, कुछ मुलाकातें हुईं लेकिन उन्होंने नेहरू का चित्र कभी नहीं बनाया।

अमृता की अपने नजदीकी मित्र एवं विश्वासपात्र इकबाल सिंह से 1937 में मुलाकात हुई थी। इकबाल ने उनसे एक बार पूछा था कि उन्होंने नेहरू का चित्र क्यों नहीं बनाया? इस पर अमृता ने जवाब दिया कि वे नेहरू का चित्र कभी नहीं बनाएंगी, क्योंकि नेहरू काफी सुंदर हैं।

फरवरी 1937 में नेहरू ने दिल्ली में हुई उनकी प्रदर्शनी में भाग लिया था। चित्रकार ने अपने एक मित्र को लिखे पत्र में नेहरू का जिक्र करते हुए कहा था कि मुझे लगता है कि वे भी मुझे पसंद करते हैं जितना कि मैं उन्हें करती हूं। वे मेरी प्रदर्शनी में आए थे और हमारी लंबी बातचीत हुई। जीवनी में सवाल उठाया गया है कि क्या उनके बीच प्रेम-प्रसंग था। यदि था तो यह कोई गंभीर प्रसंग था या केवल प्रेम पूर्व खिलवाड़ था।

डालमिया कहती हैं कि उनके संबंधों का सही स्वरूप पता लगा पाना मुश्किल है, क्योंकि बाद में नेहरू के कई पत्रों को अमृता के अभिभावकों ने उस समय जला दिया जब वे शादी (अपनी रिश्तेदार की) में भाग लेने के लिए बुडापेस्ट गई थीं। उनके पिता एक सिख सामंतवादी और मां हंगेरियाई थी। उनका जन्म शताब्दी के शुरू में 1913 में बुडापेस्ट में हुआ था।

अपने पत्रों को जलाए जाने पर अचंभा जताते हुए अमृता ने अपने पिता को लिखे पत्र में कहा था कि मैं उन्हें इसलिए नहीं छोड़कर गई थी कि वे मेरे पापपूर्ण विगत के खतरनाक गवाह हैं बल्कि मैं अपने पहले से ही भारी सामान को नहीं बढ़ाना चाहती थी। बहरहाल, मुझे लगता है कि मुझे अब उदास वृद्धावस्था में संतोष करना पड़ेगा, जो पुराने प्रेमपत्रों को पढ़ने से मिलने वाले मजे से वंचित होगी।

साभार: भाषा

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